Arun Kumar Gupta
11 साल 5 महीने पहले
‘तत्त्वज्ञान’ ही वह 'अशेष ज्ञान’ विधान है जिसे यथार्थतः जान लेने के पश्चात् कुछ भी जानना और पाना शेष नहीं रह जाता। ‘तत्त्वज्ञान’ एकमात्र परमप्रभु हेतु आरक्षित एवं सुरक्षित विधान है |
जिसका एकमात्र प्रयोगकर्ता परमात्मा-खुदा-गॉड-भगवान् ही जब परम आकाश रूप परमधाम से भू-मण्डल पर अवतरित होते हैं, हुए भी है, वह ही होते हैं ।
भगवदवतार के सिवाय किसी को भी ‘तत्त्वज्ञान’ के वास्तविक रहस्य का पता ही नहीं होता । यही कारण है कि भगवदावतार के पहचान का एकमात्र आधार तत्त्वज्ञान ही बना ।
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