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उच्चतर शिक्षा को समाज से जोड़ना

Linking higher education to society
आरंभ करने की तिथि :
Jan 22, 2015
अंतिम तिथि :
Nov 01, 2015
00:00 AM IST (GMT +5.30 Hrs)
प्रस्तुतियाँ समाप्त हो चुके

उच्चतर शिक्षा संस्थाओं की सामाजिक विकास में भूमिका लगातार ...

उच्चतर शिक्षा संस्थाओं की सामाजिक विकास में भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। हाल के वर्षों में इस शिक्षा ने अपने को समाज से अलग थलग कर लिया है और उच्चतर शिक्षा को समाज के साथ निकटता से पुन:स्थापित एवं मजबूत करने की आवश्यकता है। विश्वविद्यालय, सामाजिक जिम्मेदारी बढ़ाने तथा सामुदायिक आउटरीच कार्यक्रमों में भागीदारी कैसे बना सकता है। कुछ कार्यरत उदाहरण शेयर करना भी एक उपयोगी निवेश होगा।

फिर से कायम कर देना
691 सबमिशन दिखा रहा है
Gagan_11
Gagan_11 11 साल 5 महीने पहले
‘सा विद्या या विमुक्तये’’ अर्थात् ‘‘विद्या वही है जो मुक्ति दे’ यथार्थतः विद्या वही है जो मुक्ति तो दिखा ही दे साथ ही साथ विद्या से युक्त तथा उसके अनुसार रहने एवं कार्य करने वाले की भावी बन्धनों से भी रक्षा करती रहे अर्थात् भविष्य में भी विद्यावान् अर्थात् विद्वान् (ज्ञानी) पुरुष कर्म-बन्धन में न फँस (बँध) सके ।
Yogendra Singh_3
Yogendra Singh_3 11 साल 5 महीने पहले
आप कितना भी कठोर कानून बना लीजिए, जब तक इंसान की मानसिकता नहीं ठीक होगी तब तक कुछ नहीं हो सकता और मानसिकता का निर्माण होता है शिक्षा से। दुनिया की सभी समस्याओं का मूल कारण है गलत एवं भ्रष्ट शिक्षा पद्वति का होना। इसी के कारण आज दुनिया की यह दुर्दशा हो गई है कि विनाश के कगार पर पहुँच गई। अब इससे बचने का सिर्फ एकमात्र उपाय है कि विद्यातत्वम पद्वति को पूरी ईमानदारी के साथ प्रभावी ढंग से शीघ्रता के साथ लागू किया जाए।
Yogendra Singh_3
Yogendra Singh_3 11 साल 5 महीने पहले
‘सा विद्या या विमुक्तये’’ अर्थात् ‘‘विद्या वही है जो मुक्ति दे’ यथार्थतः विद्या वही है जो मुक्ति तो दिखा ही दे साथ ही साथ विद्या से युक्त तथा उसके अनुसार रहने एवं कार्य करने वाले की भावी बन्धनों से भी रक्षा करती रहे अर्थात् भविष्य में भी विद्यावान् अर्थात् विद्वान् (ज्ञानी) पुरुष कर्म-बन्धन में न फँस (बँध) सके ।
Arun Kumar Gupta
Arun Kumar Gupta 11 साल 5 महीने पहले
‘‘सा विद्या या विमुक्तये’’ अर्थात् ‘‘विद्या वही है जो मुक्ति दे’ यथार्थतः विद्या वही है जो मुक्ति तो दिखा ही दे साथ ही साथ विद्या से युक्त तथा उसके अनुसार रहने एवं कार्य करने वाले की भावी बन्धनों से भी रक्षा करती रहे अर्थात् भविष्य में भी विद्यावान् अर्थात् विद्वान् (ज्ञानी) पुरुष कर्म-बन्धन में न फँस (बँध) सके ।
Arun Kumar Gupta
Arun Kumar Gupta 11 साल 5 महीने पहले
‘‘सा विद्या या विमुक्तये’’ अर्थात् ‘‘विद्या वही है जो मुक्ति दे’’ ‘‘विद्या वही है जो मुक्ति दे शंष तो अविद्या के अन्तर्गत आता है । विद्या की यथार्थता को जानने वाला ही अविद्या को भी जानता है और जो विद्या की यथार्थता को समझ नहीं पाता, वह अविद्या की यथार्थता को भी नहीं समझ पाता है । दूसरे शब्दों में पारिवारिक एवं सांसारिक बन्धनों से मुक्त कराने वाली जानकारी मात्र ही विद्या है । वह विद्या-विद्या नहीं जो कर्म बन्धनों से मुक्ति न दिला सके । क्रमश::-bsbg.org
Arun Kumar Gupta
Arun Kumar Gupta 11 साल 5 महीने पहले
शिशुओं की शिक्षा-दीक्षा संस्कृति परक सदभावी सत्यान्वेषी बन्धुओं !यदि अनुशासित एवं कर्मठ तथा सुदृढ़ एवं सम्पन्न समाज स्थित-स्थापित करना है तो उसके लिए यह आवश्यकता है कि शिशुओं के लालन-पालन के साथ ही संस्कृति परक शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था हो, सभ्यता परक नहीं । बालकों का आन्तरिक उत्थान (विकास) हुए बगैर बाहय चाहे जितना भी विकास हो जाय,शान्ति और आनन्द अथवा अमन-चैन का वातावरण कदापि नहीं बन सकता। जिस प्रकार वृक्ष का आन्तरिक जड़ों का विकास ऊपरी विकास को भी फैलाता और मजबूत करता जाता है, क्रमश:--bsbg.org
Arun Kumar Gupta
Arun Kumar Gupta 11 साल 5 महीने पहले
For the Students Virtuous truth-seeker student brothers! I will say this to you student brothers with request that your this period of time is to acquire knowledge. It is said – student’s life is the golden period of the life. Brothers! Why has this proverb been said? Its reason is that this is the time for self elevation in other words, to develop themselves in the society and get the goal of life.This is the time to choose either the http://vidyatattvam-paddhati.blogspot.in/p/2.html