RAKESH KUMAR PATHAK
11 साल 8 महीने पहले
अक्सर हम किसी को सड़क किनारे, पेड़ या किसी दीवार की ओट में लघु शंका करते देखते हैं, तो हमें शर्मिंदगी सी महसूस होती है। लेकिन क्या उस व्यक्ति की व्यथा हम समझ पाते हैं? आसपास कोई मूत्रालय नहीं है, प्रैशर बना हुआ है तो ज़ाहिर है कोई भी व्यक्ति वही करेगा, जिसे देख कर हमें शर्मिंदगी महसूस हो रही थी।
सरकार को किसी भी नगर, शहर की आबादी के अनुसार सार्वजनिक मूत्रालय और शौचालय बनवाने चाहिएं। दिल्ली में हर बस स्टैंड के पास महिलाओं व पुरुषों के लिए एक-एक मूत्रालय और शौचालय होगा तो सभी को सुविधा होगी।
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