PratyakshMishra
3 years 8 months ago
आदरणीय प्रधानमंत्री जी ,
जिस प्रकार भारत सरकार ने हमारे देश के उत्पादों के प्रोत्साहन के लिए "वोकल फॉर लोकल " मुहिम की शुरुआत की है , वो अभिनंदनीय है। कुछ दिनों पहले दिवाली के अवसर पर जिस प्रकार लोगों ने आपकी अपील पर स्थानीय उत्पाद को महत्व देकर अपने देश की मिट्टी का मान बढ़ाया , वो देखकर दिल खुश हो गया।। महोदय आपकी इस पहल पर मैंने एक कविता लिखी है :
"अपनों को कुछ खुशियां बांटे "
जले दीप , रोशन गलियारा
नाव खुशियों का बोध विचारा
धन - लक्ष्मी फैली गलियों में
मिट्टी में पसरा अंधियारा ।
कुम्हार का पहिया अटक गया है
अपनी नज़रों से भटक गया है
उतर गए मिट्टी के दीपक
चीनी कंदील पे मन लटक गया है ।
मर्जी अपनी - अपनी होती है
कर्मों में स्वार्थ की ज्योति है
इस अनदेखी के कारण ,
कहीं बटें खुशियों का मीठा
कहीं भूखी आँखें रोती है ।
बस अर्ज यही करता हूँ की ,
अपनों के हम सब साथ चलें
मिट्टी के दीपक घर लाएं ,
उस वृद्धकुम्हार को अवसर दें।
जब अपनों का साथ हो , तब वह उत्सव होता है
हर चेहरे पर हो खुशियां , भगवान देख खुश होता है ।।
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