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उच्चतर शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण

Internationalization of higher education
आरंभ करने की तिथि :
Jan 22, 2015
अंतिम तिथि :
Nov 01, 2015
00:00 AM IST (GMT +5.30 Hrs)
प्रस्तुतियाँ समाप्त हो चुके

वैश्वीतकरण के परिणामस्वरूप अधिक विदेशी शिक्षा आई है। तथापि एक ...

वैश्वीतकरण के परिणामस्वरूप अधिक विदेशी शिक्षा आई है। तथापि एक अच्छीक नीति की आवश्याकता है जो सहयोग, छात्र संकाय सचलता आदि को प्रोत्साहित करे। उच्त्तर शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण को बढ़ाने के लिए आवश्यक परिवर्तन क्या है।

फिर से कायम कर देना
731 सबमिशन दिखा रहा है
Mithlesh Sharma
Mithlesh Sharma 11 साल 5 महीने पहले
1 . शिक्षा (Education) 2 . स्वाध्याय (Self Realization) 3 . अध्यात्म (Spiritualization) और 4 .तत्त्वज्ञान ; (True, Supreme & Perfect KNOWLEDGE) अथवा विद्यातत्त्वम् पद्धति ।
Manoj Gautam
Manoj Gautam 11 साल 5 महीने पहले
1 . शिक्षा (Education) 2 . स्वाध्याय (Self Realization) 3 . अध्यात्म (Spiritualization) और 4 .तत्त्वज्ञान ; (True, Supreme & Perfect KNOWLEDGE) अथवा विद्यातत्त्वम् पद्धति । शिक्षा प्रणाली आज की इतनी गिरी हुई एवं ऊल-जलूल है कि आज शिक्षा क्या दी जानी चाहिए ? और
Manoj Gautam
Manoj Gautam 11 साल 5 महीने पहले
शिक्षा प्रणाली आज की इतनी गिरी हुई एवं ऊल-जलूल है कि आज शिक्षा क्या दी जानी चाहिए ? और "शिक्षा क्या दी जा रही है यह तो ऐसा लग रहा है कि शिक्षार्थी तो शिक्षार्थी ही है, यदि शिक्षक महानुभावों से भी पूछा जाय, "इसमें उनका भी दोष कैसे दिया जाय, क्योंकि जो जैसे पढ़ेगे-जानेंगे, वे वैसे ही तो पढ़ायेंगे-जनायेंगे भी । इसमें उनका दोष देना भी व्यर्थ की बात दिखलाई देती है । इसमें उनका दोष देना भी व्यर्थ की बात दिखलाई देती है । दोष तो इस शिक्षा पद्धति के लागू करने-कराने वाली व्यवस्था रूप सरकार को ही देना चाहिए
Manoj Gautam
Manoj Gautam 11 साल 5 महीने पहले
परन्तु वह भी तो इसी शिक्षा से गुजरे हुये व यही शिक्षा पाये हुये लोगों से बनी एक व्यवस्था है । यह बात भी सही ही है "कि शिक्षा प्रणाली ही दोषपूर्ण है । यह आभाष तो प्रायः सभी को ही हो रहा है । प्रायः सभी अपने-अपने क्षमता भर आवाज भी उठा रहे है। सभी यह कहते हुये सुनाई दे रहे हैं कि शिक्षा का आमूल परिवर्तन होना चाहिए |"परन्तु वर्तमान शिक्षा को समाप्त कर दिया जाय क्योंकि वर्तमान शिक्षा पद्धति वही (आसुरी) कामिनी-कांचन प्रधान है जिसे हिरण्य कश्यप (पिता) के सभी प्रयासों के बावजूद भी प्रह्लाद ने नहीं पढ़
Manoj Gautam
Manoj Gautam 11 साल 5 महीने पहले
कैसी शिक्षा पद्धति हो या होना चाहिए, यह बात या सिद्धान्त या फार्मूला कोई नहीं दे रहा है कि शिक्षा में यह बात या यह विधि-विधान या ऐसी प्रणाली लागू किया जाय । इसी समस्या के समाधान में निम्मनलिखित ‘शिक्षा पद्धति’ प्रस्तुत किया जा रहा है ।" ‘शिक्षा’ पूर्णतः ब्रह्माण्डीय विधि-विधान पर ही आधारित हो भगवत् कृपा विशेष से प्राप्त सदानन्द का ‘मत’ तो यह है कि--‘‘शिक्षा पिण्ड और ब्रह्माण्ड में आपसी ताल-मेल बनाये रखने वाली होनी चाहिए!’’
Manoj Gautam
Manoj Gautam 11 साल 5 महीने पहले
वास्तव में जब तक पिण्ड और ब्रह्माण्ड के तुलनात्मक अध्ययन के साथ उसमें आपस में तालमेल बनाये रखने हेतु पृथक्-पृथक् पिण्ड और ब्रह्माण्ड की यथार्थतः प्रायौगिक और व्यावहारिक जानकारी तथा ब्रह्माण्डीय विधान मात्र" "ही पिण्ड का भी विधि-विधान यानी स्थायी एवं निश्चयात्मक विधि-विधान ही नहीं होगा तथा एक मात्र ब्रह्माण्डीय विधि-विधान को अध्ययन पद्धति या शिक्षा प्रणाली के रूप में लागू नहीं किया जायेगा, तब तक अभाव एवं अव्यवस्था दूर नहीं किया जा सकता है, कदापि दूर हो ही नहीं सकता ।"
Manoj Gautam
Manoj Gautam 11 साल 5 महीने पहले
यह भगवद् वाणी ही है !’ सियार की तरह से हुआँ-हुआँ-हुआँ तथा कुत्तों की तरह से भौं-भौं-भौं से काम धाम नहीं चलने को है। अभाव एवं अव्यवस्था तब तक दूर नहीं हो सकती। "जब तक कि ब्रह्माण्डीय विधि-विधान को ही पिण्डीय विधि-विधान रूप में शिक्षा विधान को स्वीकार नहीं कर लिया जायेगा । ‘शिक्षा को ब्रह्माण्डीय विधि-विधान अपनाना ही होगा, चाहे जैसे भी हो ।’ सब भगवत् कृपा पर आधारित ।"
Manoj Gautam
Manoj Gautam 11 साल 5 महीने पहले
स्वाध्याय ; Self Realization संसार में आनन्दमय मानव जीवन जीने के लिये स्वाध्याय एक अनिवार्य विधान है जो मानव के अन्तःकरण में मानवता का भाव एवं मानवीय गुणों को विकसित करता हुआ, शैतानियत-असुरता एवं पशुवत् जीवन से ऊपर उठाते हुए, मानवीय जीवन जीने की राह दिखाता है । सही मानव बनाता है। स्वाध्याय विधान से रहित मानव, मानव कहलाने के योग्य नहीं होता। वह या तो बालक या तो पशु या असुर या तो पागल कहलाने योग्य होता है ।
Manoj Gautam
Manoj Gautam 11 साल 5 महीने पहले
स्वाध्याय का विधान आध्यात्मिक महापुरुषों एवं तात्त्विक सत्पुरुष के लिये अनिवार्य नहीं होता परन्तु आध्यात्मिक महापुरुषों को भी चाहिये कि स्वाध्याय के उन विधानों को अपने जीवन में अवश्य अपनावें जो आध्यात्मिक विधान में बाधक न हो। स्वाध्याय मानव जीवन को मानवता से युक्त बनाने हेतु एक अनिवार्य विधान है, जिसके पालन में यदि थोड़ी-बहुत कठिनाई एवं परेशानी भी हो, "तो भी अनिवार्यतः इसे प्रायः सभी मानव को ही अपनाना चाहिये क्योंकि जो थोड़ी-बहुत कठिनाई एवं परेशानी भी हो, तो घवड़ाना नहीं चाहिए|
Manoj Gautam
Manoj Gautam 11 साल 5 महीने पहले
जब उसे अपने जीवन में अथवा अपने जीवन को उस के अनुसार ले चला जाता है वास्तव में सही मानव कहलाने के योग्य वही मानव होता भी है जो कठिनाइयों एवं परेशानियों के बावजूद भी अपने मानवीय अच्छे गुणों से विचलित नहीं होता बल्कि अपने में और ही दृढ़ता लाता है । मानवीय जीवन का सही मूल्याँकन कठिनाइयों एवं परेशानियों के अन्तर्गत ही होता है |" ठीक-ठाक स्थिति-परिस्थिति में नहीं । ठीक-ठाक परिस्थिति में तो अधिकतर सभी मनुष्य चल ही लेंगे तो फिर मानवता कि महत्ता कैसे जानी-समझी जा सकती है ? अर्थात् नहीं समझी जा सकती है